Thursday, March 13, 2014

मुन्नी बदनाम


होइजा खड़े-खड़े टुकुर-टुकुर का ताक रहे हो? दम है तो आ के पकड़ लो हमरी कलाई। कस के लगा लो करेजवा से। काहे अतना सरीफ बने फिरते हो? हद हो गयी भईया! ईंहा हम इसारा पर इसारा किए जा रहे हैं और तुम हो की लाजा के मुंह गाड़े जा रहे हो। समझ में नहीं आता हमको – तुम्हारा पूजा करें कि तुमको गरियावें। आही रे करमवा...प्यारो हुआ त एगो संत से।

सच बता रहे हैं। समाज-उमाज का भाय और लोक-लाज का फिकिर नहीं होता त हम पड़े-पड़े राह नहीं देख रहे होते। धर के उगलवा लेते। बताओ, करते हो कि नहीं हमसे प्यार? ई जो दस गो आलतू-फालतू बहाना लेकर हमरे भाई के पास आते रहते हो, इसका ईहे मतलब है न कि हमसे बियाह करना चाहते हो? आ ऊ जो हर दिन तुम्हारे घर से निकलने उटने का टाइम डॉट हमरे टाइम से मिलता है, माने कि तुम हमपर नजर गड़ाए रहते हो? अरू दीवाली के दिन, जब सब लोग हमारा रंगोली निहार रहा था अ तुम मुंह बा के हमको एक-टक ताक रहे थे, इसीलिए ना कि हम तुमको बहुत अच्छे लगते हैं? और ऊ दिन भूल गए...जब हम तुमसे दो बार जान-बूझकर टकराए थे और तुम्हारा सिट्टी-पिट्टी उड़ गया था, बताओ, तुम्हरे बदन में भी बिजली दौड़ी थी ना?

त खखार के कह ना मरद लेके!

काहे डेराते हो? डेरते हो कि लजाते हो, हमको त ई भी नहीं समझ में आता है। देखो, कान खोल के सुन लो – ई बिरह का गाना सुन-सुन के हम पक गए हैं। पहले ठीको लगता था, कि कोई त है जो मेरा दरद समझता है। बाकिर अब हम हाथ जोड़ लिए हैं। हेमंत दादा कहते थे कि तुम पुकार लो तुम्हारा इंतज़ार है’, हम कहते हैं साला तुम पुकारो चाहे मत, हम आ रहे हैं। येसुदास गा गए कि का करें सजनी ना आए बालम’, तो उनसे कहते हैं कि कोई बात नहीं, बलमवा लजकोक्कड़ है त हम तो दबंग हैं। रफी साहब बोले, मेरा मन तेरा प्यासा’, तो तुम भी सुन लो, हम आ रहे हैं प्यास बुझाने। मन्ना डे जी को भी बता दो, पल भर कि पहचान को जीवन भर की यारी में बदलने जा रहे हैं। अ लता दीदी, रुके रुके से कदम वाला जमाना लद गया, हम चले सैंडल पहन के,स्नो-पाउडर लगा के पिया के पास। क्यूंकी अब तो होगी रज्जा मुन्नी बदनाम।

तुम आ के अपनही इजहार कर लो, नहीं तो चौक पर पकड़ के चूम लेंगे त कोई ऑप्शन नहीं रह जाएगा। इज्जत का जो फालूदा निकलेगा ऊ अलग।

सोच लो बेटा, कल तक का टाइम देते हैं।  

Tuesday, March 4, 2014


Nah, don’t touch it. Don’t try to alter its course.

It’s so pure, let it not be smudged by your or my interpretation. It’s so vast, it will break through the frail parapet of the worldly house of definition. Someone came very close, calling it a butterfly. A butterfly that pleases where it goes, and goes where it pleases.

Let it please. But only as much it wants, it warrants. Obey its command, for when it’s not meddled by human desires, it never hurts. It’s not in its nature to hurt. It only lifts. Sleep on its carpet, wake up in its embrace, breathe in its peace, smart in its longing, cry in its coming, expect in its leaving, laugh in its generosity. Do everything but belittle it.

It is a warm shower on a perfect spring morning, sprinkled with bright fragrant petals. Let the petals touch you, tickle you, tease you. But no, resist the power to grab the petal and squeeze out the smell. It might rub off its heady perfume on your hands, but you will have wrenched out its life before it had matured to bestow that grace upon you. Let it decide, trust in its power. It may take some time, some lifetimes…but it won’t betray. Its sunshine will lit up the corners of your life; just throw away your blanket of assumptions. Its genuine care will give you more than you ever had; but be careful not to mar it with expectations.

Let it bathe you. Let it embarrass you. Let it change you. Allow it to pull you out from the mire of confusion into the arena of light. Dance with it. Remember not to dominate it. And if you see it going away, believe with the patience of a true follower, that it will return.

It’s Love. It will find a way.