Friday, April 5, 2019

तुम तक





ट्रैफिक की आपाधापी. गाड़ियों की बेइंतहा समंदर सी भीड़. स्टीयरिंग पर बेचैन होती मैं, इधर उधर कहीं से भी रस्ता बनाती मैं, घड़ी में सेकंड की सुई को कोसती हुई नज़रों से धिक्कारती मैं. यूँ कहें, हर शाम ऑफिस से घर आती हुई, तुमसे फिर मिल जाने के लिए, एक बार फिर, बेताब बेकल मैं.

ट्रैफिक की ऊब से लेकर बाहों में खो जाने का सुकून - ये सफर तुम से, तुम तक.
…………………………………………………………………………………………

कानों में शहनाई का स्वर. घर भर में पूजा की सी खुशबू. केले-अगरबत्ती-रोली-धूप से सराबोर सुगन्धित हवा. दिसंबर की ठंढ और शादी के मूड से रूमानी होती हवा. बंद दरवाजों के पीछे बल्ब की पीली रौशनी में संवरती मैं. दरवाज़े के दूसरी ओर माथा मलते तुम, जल्दी करने की गुहार लगाते तुम. जल्दी कहीं जाने की नहीं. जल्दी मुझे देखने की. वो भी तुम्हारी दी हुई साड़ी में. नारंगी साड़ी, काला ब्लाउज. न के बराबर मेकअप. खुले बाल. बड़ी बिंदी. कम से कम ज़ेवर. तुम्हारी पसंद में ढलती, खुद से और करीब महसूस करती, तैयार होती मैं.

चिटखनी खोलते ही मुझे सर से पैर तक, अधीर आँखों से पीते हुए तुम. स्तब्ध सन्नाटे में रोम-रोम से झर-झर प्रेम बहाते तुम. गहरी सांस भरकर, एक गीली सी मुस्कान पहने, "सिंदूर लगा दूँ?" पूछते तुम.

मेरा हर श्रृंगार, भीतर से बाहर तक, तुम से, तुम तक.
…………………………………………………………………………………………

ऑफिस में काम का पहाड़. काम से बढ़कर एक से एक अहम् की लड़ाई. नितांत निर्दयी होता माहौल. बेमतलब के डिमांड. बेतुकी सी बातें. बेहाल से सब लोग. इन सब के बीच जूझती, खिन्न होती मैं. धैर्य अधैर्य के बीच कहीं झुंझलाती मैं. "तुम जब भी, जहाँ भी, जितना भी अच्छा करोगी, मेरा सीना और चौड़ा होता जाएगा," अन्तःमन  में स्वतः गूंजते तुम्हारे शब्द. साथ याद आता तुम्हारा मुझपर अडिग विश्वास. प्यार लुटाती सराहना भरी तुम्हारी आँखें.

चेतना के किसी स्पष्ट छोर को पकड़कर फिर हिम्मत जुटाती मैं. जो कुछ 'अच्छा' बन पड़ता, करती चलती मैं. मुश्किल परिस्थितयों में भी डट कर लम्बी सांस भरती मैं. आँखों में पानी, जुबां में लहज़ा, दिल में नरमी...तुम सी बनने का प्रयास करती रहती मैं.

मेरा होना, मेरा चाहना, मेरा बीतना, मेरा जीतना - परिभाषित होता - तुम से, तुम तक.
…………………………………………………………………………………………

Tuesday, March 26, 2019

The gift


The bohemians were about to meet me. The boho girl with twinkling eyes. With her equally zany partner with his ear to ear grin. My favourite couple, this.

Love and excitement welled up within me. The way it always did. At the thought of her. At the mention of them. At the mere prospect of meeting these jovial people. Play. Mischief. Banter. All good feelings flooded my heart.

The reunion happened on the swanky sidewalks of Gurgaon Cyber City. Her hugs were always brief; she never seemed too comfortable with cloying show of emotions. His were the languorous kinds. One could never have enough of the both of them. After receiving and giving snug hugs, we settled someplace for lunch. She next to me, he right opposite.

I don’t remember what the name of that restaurant was nor what we ordered. But I do remember, with HD clarity, the moments that will remain etched in my memory forever. The talk was about their Kashmir trip, from where they had just returned. Given her classy and saucy wit, she did most of the talking. He contributed, as usual, through brief but legendary observations. She, the food. He, the salt. I simply relished and rejoiced in the blissful stream of their joie de vivre.

He asked the waiter where the washroom was, and went to the indicated place for a loo break. I was therefore surprised when seconds later I found him right behind me, his arms wide open, holding a beautiful Kashmiri shawl with flowered embroidery. Before I understood what was happening, he simply wrapped me in the shawl with a warm hug and said, “I thought you must be cold.” She watched on with eyes pouring out love. Time stood motionless in the immortality of that moment. That feeling. That love-soaked completeness.
Love, when draped, looks like this
To love them, and be loved in return, is grace enough. But the gift, and more importantly, the way it was gifted, is the kind of story that should be saved for posterity. And for everyone who loved, and was loved.


Wednesday, January 2, 2019

तुम्हारा ऐसा होना

तुम्हारा चेहरा नीचे करके एकाग्र ध्यान से सामने वाले को देखना
तुम्हारा बातों को वैसे सुनना जैसे छोटे बच्चे का माँ को
तुम्हारा खड़े होकर अंगड़ाई लेना
तुम्हारा औरों का आभास इतना बारीक होना
तुम्हारा माथे पर बल न आने देना
तुम्हारा आवाज़ को कर्कश न होने देना
तुम्हारा हमेशा न तैयार होकर भी तैयार रहना
तुम्हारा हमेशा सब कुछ जानना और कुछ न तौलना
तुम्हारा चलते फिरते किसी भी शीशे में बाल सेट करना
तुम्हारा गंभीर मतभेदों को भी हँसते-खेलते झेल जाना
संगीत सुनते ही तुम्हारे सिर का सुर में हलके-हलके नाचना
तुम्हारी बातों का कानों पर वैसे बीतना जैसे बारिश की बूंदों का होठों पर
तुम्हारा अक्सर हंसना और हंसी बिखेरना
तुम ही कहो, तुम्हारा ऐसा होना
अगर खुदाई का गवाह नहीं,
तो और क्या है?