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गोल गुम्बद और गुफ्तगू

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  कॉलेज के दिनों की तरह दोनों गोल गुम्बद के सामने बेंच पर बैठे थे। जब भी मिलते , यहीं मिलते। एक तरफ मेथोडिस्ट चर्च और दूसरी तरफ मुग़लई गुम्बद उन्हें अलग अलग टाइम ज़ोन में एक साथ होने का आभास देता । दोनों दिल्ली वासी न होकर भी दिल्ली में ही पले बढ़े थे। इस शहर में इतिहास छितराया हुआ है , वो कहती। बस क्रम जानने की देर है , कहानी आप ही बन जाएगी। बरसों बाद वापस उसी गुलमोहर के नीचे बैठने में एक अजीब सा सुकून है , नहीं ? वो गुलमोहर के आधे पीले आधे हरे पत्तों में जाने क्या ढूंढती हुई बोली। सुकून तुझसे फिर से मिलने में है यू फूल , उसने उसका सर थपथपाते हुए बोला। जैसे वो कोई बच्ची हो। पूरी दुनिया में एक यही लड़की है जिसने मुझे ये सिखाया है कि मैं प्यार कैसे करता हूँ , उसने मन ही मन सोचा। बच्ची हंसी। आँखों की क्रो लाइन्स उभर आईं। दिल्ली के जाड़ों में उसका उज्जवल चेहरा और ठंढ से लाल पड़े गाल जैसे और बेबाक हो उठे थे। कुछ ही बरस मे...