Saturday, January 21, 2017

माँ के लिए फेसबुक गाइड


माँ मेरी,

बचपन से आज तक तुम हमको पढ़ाती-सिखाती आयी. यह तो तुम ही बता सकती हो कि तुम्हारे पाठ-प्रवचन का हमपर कितना असर पड़ा. हम तो बस इतना जानते हैं कि हम मिटटी रहे और तुम मेरी कुम्हारी, जो इतने प्यार से हमको ढाली कि हम तुम बन गए.

खैर, गए हफ्ते जब तुम्हारा फेसबुक पर आगमन हुआ, तो हमको चुहल हुई तुमको पढ़ाने की (यहाँ मेरा 'अनुभव' - तुम्हारा favourite शब्द - तुमसे ज़्यादा है). ज्ञान उड़ेलने की दुनिया में तुम स्वेच्छा से चली हो, तो शुरुआत चलो हम ही करते हैं. 


सबसे ज़रूरी बात सबसे पहले. फेसबुक दुनिया का आधुनिक मेला है. बटन दबाते ही जीवंत हो जाने वाली इस दुनिया में साधारण रूप से सम्भले हुए लोग भी रोज़ाना 40-50 मिनट बिताते हैं. इसलिए चौकस रहना . समय की बर्बादी में अगर कोई और मनोरंजन इससे आगे है तो वो है सास-बहू सीरियल.  जब तुम सीरियल के मोह में कभी नहीं फसी (thank god for that), तो मुझे उम्मीद है ये भी तुम्हरा कुछ बिगाड़ पायेगी. वैसे सीरियल और फेसबुक - दोनों की मूल सामग्री एक सी है - दिखावा, ईर्ष्या, सुनहरे सपने, दार्शनिक ज्ञान, बनावटी सुंदरता, इत्यादि.

यहां गज़ब तमाशे देखने को मिलते हैं.  अजीब विकृत सा मनोरंजन है. प्यार का इज़हार आमने -सामने हो हो, यहाँ इसकी होड़ लगी रहती है. मज़ा तब आता है जब प्रतिभागी, जिनमें कई मियाँ-बीवी, ससुर-दामाद, सास-बहू, ऑफिस सहकर्मी शामिल हैं, एक दूसरे के लिए प्यार की गंगा-यमुना बहाते हैं.  बाहों में बाहें डाले ये लोग यथार्थ में एक दूसरे के खून के प्यासे हों, और ये तथ्य पूरी दुनिया को विदित भी हो, तो भी फेसबुक पर यह प्रचार नहीं रुकता. पता नहीं इनमें से क्या अधिक हास्यास्पद है - फरेब की खूबसूरती या इंसान की कुरूपता.

हमारे बड़े पुराने कह गए, “Be slow in choosing friends and slower in changing.” ज़ाहिर है, फेसबुक इस विचारधारा के बिलकुल विपरीत है. यहां व्यक्ति से मिलना तो दूर, फ़ोन पर ही बात करके दोस्त की सूची में उपस्थिति दर्ज हो जाती है. कई ऐसे लोग भी देखने को मिले जो सिर्फ दोस्त बनाने के लिए फेसबुक पर बैठे हैं. आये दिन उनसे दोस्ती की सिफारिश आती है. इन लोगों के दिल में सूनापन है या  अईयाश, यह तो मुझे ज्ञात नहीं, पर इनसे दूर रहना निस्संदेह अपनी सुख शान्ति के लिए अच्छा है. यहां दोस्तों की तादाद जिस अनुपात से बढ़ेगी, समझ लेना दोस्ती की गहराई उसी दर से घटेगी.

फेसबुक के दोस्त तुम्हें सुबह से रात तक यह बताने को उत्सुक रहेंगे कि वे कहाँ कहाँ गए, क्या क्या खाया, क्या क्या खरीदा, क्या कुछ सोचा, किससे किससे कौन कौन सी बात की वगैरह वगैरह। यहां तक कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं, उस ख़ास अभिव्यक्ति की सुहूलियत के लिए स्वयं फेसबुक ने कई चहरे ईजाद किये हैं. वो किस भाव से गुज़र रहे हैं ये बताने के लिए बाक़ायदा drop-down लिस्ट है! कहो भला, जिन अनर्गल बातों से मन में निपट लेने को ही सूझ समझा जाता था, आज उनकी नुमाइश को इतना तवज्जो मिलेगा, कभी तुमने सोचा था? मैं तो कहती हूँ, मार्क ज़ुकरबर्ग को सर्वश्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक का खिताब सौंप देना चाहिए. बदलते मानवीय परिवेश में इंसान की बुद्धि का इतना सटीक पूर्वानुमान लगाना, और उसपर अरबों का व्यवसाय खड़ा कर देना, सिद्ध ज्योतिषी है आदमी.

वैसे फेसबुक के कई फायदे भी हैं. भूले बिसरे दोस्तों से तार जुड़ जाते हैं. प्यारे लोगों की तसवीरें सहज रूप से दिख जाती हैं. खुशियों को बांटना और शुभ समाचार से अवगत रहना सरल हो गया है. दोस्तों रिश्तेदारों के जन्मदिन आप ज़रूर भूल जाएँ, पर यह यंत्र आपको सब याद दिलाता चलता है. किसी का ध्यान किसी बात पर ख़ास आकर्षित करने के लिए तुम उनको 'tag' कर सकती हो (फेसबुक चहरे भी पहचानता है). कुछ नासमझ लोग तुमको बिना बात tag करेंगे. तुम उनको बिना बताये खुद को untag कर देना. Candy crush खेलने जैसे बेकार प्रस्तावों को अनदेखा करते चलना.

कई बार सोचती हूँ, आजी आज जीवित होती तो इन्टरनेट के इस जमघट पर क्या टिप्पणी करती (और वो कितना रोचक होता!)

अद्भुत नज़ारे, उत्तम लेखन, प्रेरणाप्रद उक्तियाँ, झटपट खबरें, निराली घटनाएं, विविध परिप्रेक्ष्य, आम ज्ञान से भरपूर है यह मैदान. कुछ स्व-घोषित बुद्धीजीवी यहां के स्थाई निवासी हैं. उनके मुंह से ज्ञान सांप के मुंह से अमृत बरसने जैसा प्रतीत होता है. दुःख तब होता है जब ये लोग हिंदी और अंग्रेज़ी, दोनों के सुख को सूख लेते हैं, क्योंकि वे दोनों में फ़र्क़ नहीं समझते. मैं ये सोचकर उनसे सहानुभूति रखती हूँ कि उनके पिता मेरे पिता जैसे नहीं रहे होंगे. तुम भी कोई बहाना ढूंढ लो.

बहरहाल, फेसबुक के संसार में तुम्हारा पुनः स्वागत है. तुम्हारी हंसी की झंकार यहां भी गूंजे, इसके कारण और गूंजे, यही प्रार्थना है.

तुम्हारी,

सोनल