Friday, July 27, 2012

Only yesterday



Only yesterday
i chanced upon
the wellspring of my life
only yesterday
i set eyes on
the darling of my life

he asks me what i derive
from just looking at him
my lips part in answer
in silence my eyes brim

i run my palms through his hair
and hold him tight to my chest
he's that one rain i pine for
in him i find love, in his arms, i rest.

Wednesday, July 25, 2012

I know you know girl



i know you feel
the weight of my eyes on your back
i know it's me you search for
when your head keeps turning to the track

i know you hear me whisper
tender words into your ear
a thread of love runs down your spine
you're immersed in me, i'm so near

i know you dream of me
tracing fingers down your skin
i fathom the depth of your longing
the line between us, so thin

i know i'm always besides you
and in every moment we commune
our chemistry inimitable, pure, perfect
an orchestra never out of tune

i know baby, that you love me
a fact you haven't and can't deny
your face, eyes and touch connote
meanings that words can't even try

some pain, is good



A certain amount of pain, of unfulfilment, is good.

it adds the passion to your dance
it stirs up the melody in your song
it lends a little sorrow to your writing
it increases the length of your breath
it slows down your gait a bit
it heightens your observation
it deepens your speech
it mellows down your temper
it replaces anxiety with patience
it makes you kinder than necessary
it makes you more aware of yourself

So, a certain amount of pain IS good.

P.S. - You see darling, you might not be with me, but you still help me grow.

Wednesday, July 4, 2012

वो आखें, मेरी हैं

हाँ , वहीं.

ठीक उसी पेड़ के नीचे, नहीं ज़मीन पर नहीं, उस पेड़ की छाया के बीच...जड़ से ऊपर और पत्तों से नीचे, वहीँ कहीं रहती हैं आज कल मेरी आँखें.

एक ज़माना था जब तुम रोज़ वहां से कम से कम दो बार तो गुज़रते थे। सुबह और शाम। मुझे याद है। अगर पेंट करना जानती तो ठीक उतार देती। तुम्हारे बदन की बनावट, तुम्हारी दूसरी दुनिया की हसीं, तुम्हारे आँखों की चमक, तुम्हारा भौहें उठाकर चिढाना, तुम्हारी शहद में डूबी हुई उँगलियाँ, यहाँ तक की तुम्हारी खुशबू भी। हूबहू 3डी बना देती, अगर बना पाती. 

हाँ, तो मेरी आँखें। मुहावरों की दुनिया में सुना था पलके बिछा कर इंतज़ार करना. पर आँखों को किसी किनारे सौंप आना? सरासर बेवकूफी है।

मेरी दो बेवक़ूफ़ आँखें महीने भर से तुम्हें एक झलक देखने के लिए मर रहीं है। सुबह तो मानो एक उन्माद सा  छा जाता है उनपर. तुम्हारे पूरे इलाके के चक्कर काटती हैं। ठीक उस मक्खी की तरह जो खिड़की से बहार निकलने का दमतोड़ पर व्यर्थ प्रयास करती हैं। तुम्हे देखे बिना थोडा और सूख जाती हैं. दिन की गर्मी में पेड़ की छाओं में चंद लम्हों के लिए सो भी जाती हैं (अच्छा है, क्योंकि सपनों में तुम नियमित रूप से आते हो). शाम होते होते फिर आवारा कुत्तों की तरह तुम्हारे मोहल्ले में दौड़ने लगती हैं। रोज़ नाकामी ही उनके हाथ लगती है। रात भर सुबक सुबक कर रोती  हैं। कसम खाती हैं की तुम्हें ढूँढने को नहीं निकलेंगी. अपने शरीर में पुनः सम्मलित हो जाएँगी. फिर सवेरा आता है....और तारिख छोड़कर कुछ नहीं बदलता है।

ज़रा कोई देखना। मेरे मनाने से नहीं मानती, क्या पता तुम्हारे कहने से लौट आयें। मेरी आँखें।