Tuesday, May 26, 2015

मलाई बाई


जब चुना तुमने बाहर का द्वार
फंदे के रास्ते
तुम्हारे साथ रुखसत हुए  
तुम्हारे बेबात नखड़े
तुम्हारी बेबाक हंसी

तब पता चला कि है नहीं
दुःख पचाने की ताकत मुझमें
या हमारी तीसरी सहेली में
जब देखा उसको भी मैंने
तुम्हारा नाम आने पर हाथ मलते

यकीनन सब ठीक न था
यह तो सात दिन पहले
तुम्हारे चहरे से बयां था
जो तुमसे प्रकट न हुआ
उसका मर्म हमें खींचता है
दुखद, अज्ञात, भयावह

तुम्हारा, हमारा जीवन
एक अधूरा सवाल
उसके उत्तर की अपेक्षा
है या तो व्यर्थ,
या ज्ञान का निचोड़

तुम्हें दिखते हैं न हम?
ग्लानि की अज्ञेय-सी लाचारी से जूझते हुए?

एक अलग ही रिश्ता था हमारा
जिसके तीन भिन्न पूरक थे
एक अनकहा सा प्यार हमारे बीच
(तुम खुल कर कहने से ठहरी)
वो प्रतिदिन मिलने का अनुशासन
गवाह था, प्रौढ़ मित्रता का
निजी बातें अप्रत्यक्ष, पर सब पता
आलिंगन, शायद एक भी नहीं

फिर मैं क्यूँ देखती हूँ आये दिन
तुम्हारी तस्वीरें
तुम्हारी मलाई-नुमा बाहें
तुम्हारा साइड-पोज़ में इतराना
हमेशा मुंह पर आते बाल
और दांत-छिपाए
फोटो वाली सभ्य मुस्कान

कितना कम कहती हैं ये निशानियाँ  
फिर कैसे कर जातीं हैं आर-पार
एक काँटा तुम्हारी याद का
टीसों में तुम्हें पुकारता है,
चुप हो जाता है
छुप छुप कर रोता है -
जब मुख्य आकर्षण ही मंच छोड़ जाए
तो कहाँ जाएँ वो सखियाँ
जिन्होंने बिताईं हज़ार दोपहरें
तुम्हें छेड़ने के परम-आनंद में

बात बात पर भिड़ जाना
shopping की मिसालें कायम करना
नाखून रंगना और गहने ख़रीदना
इधर-उधर की बातें हज़ार
बालों में उलझी उंगलियाँ दिन रात -
इन पक्षों में हमारी शून्यता
की भरपाई करती थी तुम

हिम्मत बटोर रही हूँ
कि बिना लड़खड़ाये पहन सकूं
तुम्हारा दिया हुआ party-wear
और Boss परफ्यूम
स्थिर होकर देख सकूं
ठीक तुम-सा, तुम्हारे बेटे को 

उस दिन, शान्ति स्थल पर
जब देखा तुम्हें आखिरी बार
पहली दफा तुम चुप थी
इतनी सुन्दर, निर्मल, जीवंत!
फूलों से गुलाबी तुम्हारे होठ
वही दूधिया रंग
अनुचित लगते, सिमटे हुए बाल
सुहागन की जोड़ी
शायद तुमने उस दिन
जिससे, जो भी कहना चाहा था
कह दिया, जड़ दिया
वो स्थाई काँटा, तुम्हारी याद का.

Monday, May 11, 2015

परहित = परमानन्द

Replace woman with human, and you have the meaning complete


युगों युगों से मानव सभ्यता की कोशिश रही है, उस रहस्य का पता लगाना, जिसे आत्मसात कर लेने से मनुष्य एक ऐसी मनोस्थिति में खुद को पाता है, जहां आनंद ही आनंद है. जहाँ न भविष्य की चिंता, न भूत का पश्चाताप, न समाज का भय, न स्वीकृति की आवश्यकता. बस, एकल सुख.

मैं वेदों की ज्ञाता नहीं. सत्य की विदुषी नहीं. मुझे ईश्वर में आस्था नहीं. गुरुओं और बाबाओं से दूर रहने वाली ठहरी. उन दुकानों में लोगों को जैसा जाते देखा, वैसा ही आते देखा, किंचित अधिक रूढ़ियों के साथ.

कर्म ही मेरी पूजा रही. अध्ययन को तपस्या माना. सीखने और जानने की लालसा को प्रेरणा का स्रोत बनाया. पेड़ों के पत्तों से छनती धूप में सृष्टि का जादू देखा. इंसानों के सौहार्द में सरस्वती की वीणा सुनाई दी. पंछियों की चहचहाहट में अप्सराओं की हंसी. कुछ मनुष्य तो साक्षात भगवान के अवतार नज़र आये.

लेकिन इन सब से परे - प्रकृति, जीव, मित्रता, कर्म, प्रेम, करुणा, साहित्य, नृत्य, संगीत, अभिव्यक्ति, ज्ञान, सम्बन्ध – अगर कोई एक ऐसी अनुभूति है, जो सबसे अधिक सुखमय है, तो वह है, परहित की.

हाल ही में मुझे कुछ ऐसे कामों को मुकम्मल करने का सौभाग्य मिला, जिससे हज़ारों जिंदगियों को मदद मिलेगी. प्रत्यक्ष रूप से इसमें मुझे कोई लाभ नहीं हुआ, मेरा इरादा वो था भी नहीं, लेकिन एक बार फिर जीवन ने अपने ढंग से साबित कर दिया, कि सच की जीत, और झूठ की हार, सनातन सत्य है. इस यात्रा में जिन लोगों ने मेरी सहायता की, मैं उनकी शुक्रगुज़ार हूँ. जिन लोगों ने जाने-अनजाने में मुझे रोकने की कोशिश की, मैं उनका नमन करती हूँ, और अपने अंतर्मन को प्रणाम, क्यूंकि दोनों ने मिलकर मुझे यह सिखाया, कि अगर कभी भी, किसी भी हालत में, आप दुविधा में हों, तो सिर्फ और सिर्फ, अपने मन की करें.   

हममें से कुछ लोग होते हैं, और जो हैं वो मेरी इस बात को पूरी तरह से समझ रहे होंगे, जिन्होंने निःस्वार्थ सेवा को, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, अपना लक्ष्य बनाया है. ज़ाहिर है, ऐसे लोग मेरे परम-मित्र हैं. एक अजीब सी, असीम सी खुशी है, दूसरे की मदद करने में. दूसरा मतलब अपना और परा, दोनों.

स्पष्ट कर दूं, कि परहित यानी वो नहीं, जो आप हमसे कराना चाहते हैं. परहित मतलब वो, जो हमें करने योग्य लगता है. सही कारणों के लिए. हमारे मुताबिक़ सही. हमारी परिभाषाओं के अनुसार. Ayn Rand, अंग्रेज़ी की मेरी प्रिय लेखिका ने कहा था, “To say I love you to someone, you have to say the I first.” हम वो हम हैं, जिसे आप प्रभावित ज़रूर कर सकते हैं, लेकिन जिसपर आप अपनी मिल्कियत नहीं जमा सकते.

हमें मंदिरों की घंटियों में नहीं, रिश्तों के आडम्बर में नहीं, पद की पुष्टि में नहीं, साज-सामान में नहीं, घूमने-फिरने में नहीं, Mall-shopping में नहीं, कृत्रिम अभिनय में नहीं...बल्कि किसी और को सशक्त करने में सबसे अधिक मज़ा आता है. हमारा सबसे बड़ा संतोष यह नहीं कि हम फलाना की मालकिन हैं या फलाना की संबंधी. हमारा संतोष इसमें है, कि हम क्या हैं. कि हमारे होने से यह धरती कैसे बहतर है.

परहित हमारा परमानन्द है.