Wednesday, February 25, 2015

सरप्राइज


तुम्हें अकस्मात् देखने की खुशी.

सच में. ये शायर लोग झूठ नहीं कहते थे. मन में बेचैनी और प्यार का मिला जुला ज्वार फूटता है. जुल्फों में हवा की रवानी बढ़ जाती हैं. दिल की बंजर धरा पर जम कर बरसात होती है. कानों में शहनाइयों की गूँज, हवा में बहती खुशबू, लहू में उफान और मंज़र में सिर्फ गुलशन-गुलशन. हरा, पीला, गुलाबी, लाल...सारे रंग तुम्हारे इर्द गिर्द नज़र आते हैं. मन फूले नहीं समता है. सभ्यता के कानून बेड़ियों की तरह अभिव्यक्ति को कैद करके भी रोक नहीं पाते हैं. जो अनकही, अनकरी रह जाती है, वो आँखों से झर-झर प्रेम बनकर बहती है.

लगता है जैसे इसी ख़ास अनुभूति के लिए समय की कोक से यह दिन जन्मा था. आज वक़्त की डायरी में मेरे लिए एक विशेष एन्ट्री थी. एक ऐसा उपहार जिसे पाने की खुशी मैं दोनों हाथों, या पूरे शरीर, या पूरे ब्रह्माण्ड में भी समेट न पाऊँ. ये सब कह देने के बाद भी बात अधूरी रह जाती है. शायद इसलिए कि इस ख़ुशी को एक लेख में बांधना उतना ही असंभव है जितना एक नदी को अपनी आगोश में एक समंदर को कैद करना.

हाँ लेकिन सोचिये ज़रा, मिलन के कुछ क्षण पहले उस नदी की हलचल, जो अपने समंदर में समाने के लिए जन्मों से अधीर रही है. जिस दिन से उसने सफ़र शुरू किया है, कभी बलखाती-मचलती, तो कभी गिरती-पड़ती, वो एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ी है – अपने परम-प्रिय में लीन हो जाना. उस स्वर्गीय सुख का अनुभव करने के लिए जिसकी उसने अभी तक बस कल्पना की है.

सफ़र आनंदमय भी रहा है, कठोर भी. कभी धरती ने मखमल की तरह निर्मल निमंत्रण दिया है, तो कभी पथरीली राहों से गुज़री है वो. कहीं उसे देवी मानकर पूजा गया है, तो कहीं उसे मैल धोने का साधन बनाया गया है. एक ओर रंगीली मछलियों का मनमोहक साथ, तो दूसरी ओर ओट में पलते ज़हरीले साँपों का विष. कभी बर्फ ओढ़कर तो कभी तपती भूमि पर, हर मौसम हर हाल में बस चलती चली है. भीषण ग्रीष्म में अपने अस्तित्व के लेशमात्र को संजोकर रखा है उसने – उस प्रीतम के लिए जिससे मिलन, उसकी अथक यात्रा का कारण भी है, और पुरस्कार भी. 

सदियों की सफ़र के बाद, नदी चंचल कम, और शांत अधिक हो गयी है. लेकिन समुद्र का नाम सुनते ही उसकी लहरों में वही उछाल आता है जैसा पहले दिन होता था. वही स्पंदन और स्फूर्ती. वही दीवानों सी तड़प. वही अतृप्त प्यास. वही बेकल प्यार. वही छलकती मुस्कान.

अब लगने लगा है कि सफ़र अंतिम चरण में है. नदी को सागर दिख तो नहीं रहा, लेकिन उसकी खुशबू-सी आ रही है. एक अजीब एहसास नदी को दस्तक दिए जा रही है. कुछ दूर जैसे प्रियतम की कलकल ध्वनि उसे फुसफुसा कर, कभी आग्रह से, तो कभी छेड़कर, बुला रही है.

उस क्षण, कितनी तीव्र होती होगी नदी की इच्छा. कितना विह्वल उसका उन्माद. कितना अलौकिक उसका सुख. 

तुमसे अचानक, बिना योजना के, यूं ही मिल जाने में ठीक वैसा सुख है. उसमें लक्ष्य को हासिल करने का संतोष तो नहीं, लेकिन उसके करीब होने के असंख्य संभावनाओं की अपार खुशी है. 

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