Sunday, August 24, 2014

बहाने

“जब-जब मेरी याद आये, किसी भी बहाने से मुझे बुला लेना...”
ट्रेन में चढ़ने से कुछ मिनट पहले तुम दाँत चिआरते हुए कह गए. मैं दूर तक तुमको देखती रही. ट्रेन की छुक-छुक जब मेरे दिल की धड़कन सी तेज़ हो गयी, तब तक. पटरी पर घड़घड़ाते हुए आखिरी डब्बे के निकल जाने के बाद तक. प्लेटफार्म से भीड़ छंट जाने के बाद तक. मेरे मन में उदासी का एक भारी सा लौंदा पिघलकर पानी, और फिर उड़कर काले बादलों सा घिर आया, तब तक...मैं देखती रही, सोचती रही.
किसी भी बहाने से बुला लेना?
सुबह कॉलेज जाने से पहले, जब बस स्टॉप से उतर के, बेसब्री से सड़क पार करके तुम्हारी बाइक तक जाते-जाते पसीने से लथ-पथ हो जाती थी, तब तुम अपने हाथ से ग्लव उतारकर मेरे माथे का पसीना पोछ देते थे. फिर उतने ही ध्यान से होंठ के ऊपर जमी बूंदों को ऊँगली फेरकर ऐसे समेटते थे जैसे समुन्दर की गहराइयों से निकले मोती हों. फिर मेरे चहरे को हाथ में बटोरकर कहते थे – good morning Rockstar! और मैं हर दिन, उसी हैरानी, उसी मेहरबानी के साथ ज़िंदगी का शुक्रिया अदा करती थी जिसने तुमसे सिर्फ मिलाया ही नहीं, तुम्हारा प्यार भी मुकम्मल कराया.
तुम्हारे जाने के बाद, अन्दर और बाहर, लगातार पसीना बहता है. खारे पानी ने ज़ख्मों को हरा कर दिया है. पसीने का नमक neutralize करने की ज़रुरत है, इसी बहाने आ जाओ. क्यों?
Church वाले मोड़ पर जब red light पर हमारे बाइक रूकती थी तब सुबह की धूप ठीक मेरी आँखों पर पड़ रही होती थी. तब तुम एक हाथ से हैंडल संभालते हुए, दोनों पैर ज़मीन पर जमाकर, पीछे मुड़कर एक हाथ से धूप छेंक देते थे. माँ धूप में बच्चे को छाता ओढ़ा देती है, तुम यूं कहते थे.
धूप और कड़ी हो गयी है. बच्चा तुम्हारे इंतज़ार में झुलस रहा है. आने का ये बहाना कैसा रहेगा?
कॉलेज के बाकी लड़के मुझसे बात करते थे तो तुम छुपकर कोने से देखते थे. बाद में कोहनी मारकर चिढ़ाते थे- रूप चुराते हैं सभी! तुम्हारी हंसी से न जाने कितने गैलेक्सीस के सूरज खिल उठते हैं, तुम कहते. ये लोग उसकी धुली रौशनी में गोते लगाने आते हैं...मेरी जान का रूप चुराते हैं.
ये सूरज, जो तुम्हारे जाते ही न जाने कहाँ ढल गए, तब से दिखे नहीं. तुम्हें तलाशती आखें मायूस हो रखी हैं. ज़िन्दगी गीली शामों की कड़ी बन गयी है. एक नया सवेरा लेकर आ जाओ. ये वाला तो काफी valid बहाना है, नहीं?
वो मेरी समझाने की चाह थी या तुम्हारी दीवानगी का एक और नमूना, child psychology कि क्लास के बाद जब मैं हमारे दोस्तों को concepts समझाने में लीन रहती थी तब तुम कभी मेरा तो कभी दूसरों का मुंह ताकते रहते. और जब उनकी दुविधाएं दूर हो जातीं, तब तुम सर यूं ऊँचा करके घूमते जैसे मैंने भारत की आर्थिक समस्याओं का हल कर दिया हो! ठीक उसी संतोष के लिए मैं जी लगा के मेहनत करती.
अब समझाते समय, जब तुम्हारी आँखें मुझपर गड़ी नहीं रहतीं, तो कागज़ के प्लेन की तरह दिशाहीन हो जाती हूँ. कम-से-कम हमारे दोस्तों का भला होता रहे, इसी बहाने आ जाओ.
योग क्लास के बाद पेड़ की छाँव तले बैठकर मैंने तुम्हें मसाज करना सिखाया था, वैसा, जैसा मुझे पसंद है. कहाँ अंगूठे का ज़ोर, तो कहाँ हथेली का, कब उँगली दबाकर, तो कब उसे घसीटकर ले जाना है, तुम्हारे शरीर पर practical करके समझाया था. अगर बीच-बीच में होने वाली स्लिप को अनदेखा कर दें, तो काफी माहिर होने लगे थे तुम.
तुम दूर क्या गए, मांस-पेशियाँ सुन्न होने लगीं हैं. Temptation न सही, मेडिकल मजबूरी ही समझकर आ जाओ. 
वो मेरे गले में सोने की चेन, जिसे तुम दांतों के बीच दबाकर अपनी और खींचते थे. वो मेरे काम कि लिस्ट, जिसका रिमाइंडर तुम अपने मोबाइल पर चढ़ा कर रखते थे, मेरे खोये हुए झुमकों और बूंदों का आधा-जोड़ा, जिसे सहेजकर अपने बैग की साइड-चेन में छुपाये फिरते थे, वो कामयाबी के सपने, जिसमें हम रोज़ एक नयी कड़ी जोड़ते थे, वो दिन की रौशनी में ठहाके वाली हंसी, वो ढलती शाम में लम्बी आहें, और जाड़े की शामों में तुम्हारी सुगंध में डूबा वो गर्म अहसास...तुम उस ट्रेन में अपने साथ वो चैन, वो खुशी, वो प्यार, वो सपने, वो हंसी, वो शामें, वो नैसर्गिक सौंदर्य, सब ले गए. जो हमारा है, उसे हमको वापस सौंपने का बहाना तो जायज़ है न?
कुछ भी कह लो, मुझे तुम्हारे हर पल के साथ से एक चुटकी कम भी गवारा नहीं है. तुम, जो खुद मेरे जीने का बहाना हो, तुम्हें बुलाने के लिए क्या बहन ढूंढूं? तुम जिसे बहाने कहते हो, वो मेरे अधरों से रुखसत हर आह की गुजारिश है. मेरे प्राणों का निचोड़ है. मेरा एकलौता लक्ष्य है. मेरे मन का मंज़र है.
अगर अब भी तुम्हें बहानों की तलाश है तो गणित साधारण है. 365 गुना 24 गुना उतने साल जितनी हमारी उम्र बाकी है. तुम नंबर तो बताओ, मैं उससे एक बहाना अधिक गिनवा दूँगी. 

4 comments:

  1. उफ्फ ऐसे कोई किसी को याद करे तो...

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  2. Manish Sir, aise koi kisi ko yaad kare toh.... koi pal bhar bhi dur naa reh payega. Haina?

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  3. सवाल भी पूछ लिया गया और जवाब भी हाज़िर हो गया. कुछ कहने को बाकी न रहा.

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    1. "..." का इस्तेमाल तब होता है जब कहने को बहुत कुछ हो और कहा ना जाए। :)

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