Friday, September 19, 2014

हिंदी.


हिंदी. मेरे बचपन की भूली-बिसरी सहेली.

बोकारो तक इसके साथ जम कर खेली, याद है. लेकिन दिल्ली आने के बाद सब कुछ बदल गया. चौथी क्लास के बीचो-बीच बैठकर पहली बार यह अहसास हुआ कि medium of instruction अगर अचानक से बदल जाए, तो दिमाग का सन्नाटा बहरा बना देता है. उस साल पहली बार, और आखिरी बार, अंतिम परीक्षा में मैंने 80% से कम स्कोर किया. दिल चूर-चूर हो गया. वो अलग बात है कि काव्य पाठ और वाद-विवाद में मैं हिंदी की ही होकर रह गयी. आज भी मुझे स्कूल के कुछ दोस्त 'हिंदी वाली सोनल' के नाम से बहतर पहचानते हैं.

बड़े बोझिल हृदय से मन को अंग्रेज़ी की ओर झुकाया. कई साल लग गए अपनी प्राथमिक भाषा बदलने में. मानती हूँ कि शुरू शुरू में बड़ी कुढ़न हुई. दिल्ली वालों के चक्कर में अंग्रेज़ी सीखने पर विवश होकर. लेकिन जैसे जैसे मैं इस नयी भाषा को जानती गयी, समझती गयी...लगा जैसे मेरे मन कि बात को मुखरित करने के लिए ख़ास बनाई गयी है ये भाषा. अंग्रेज़ी से प्रेम का सिलसिला स्कूल से शुरू हुआ, और इस तरह रम गयी उसके प्यार में कि आज अभी रूह को तिनके का सहारा चाहिए होता है, तो वो roman alphabet के रूप में ही आता है.

हिंदी मेरे जीवन से पिछड़ गयी. लेकिन छूटी नहीं. इतना सुन्दर इसका रूप, इतनी गहरी इसकी अभिव्यक्ति...इस भाषा के लिए मन में आज भी वही आदर और प्रेम भाव है जो बचपन में था.

शायद इसलिए, क्यूंकि में दोनों भाषाओं से अत्यंत प्यार करती हूँ, किसी एक के साथ पक्षपात होते देख मन कचोट जाता है. हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई जिसे मैं अभी तक भूल नहीं पाई हूँ. बात पुरानी है, लेकिन सिद्धांत शाश्वत है.

भाषा बाहरी आभूषणों में से एक है. मात्र इसके आधार पर धारणाएं बनाना अन्याय है.

आप भी पढ़िए ये ब्लॉग. और सोचिये क्या बीती होगी उन सोलह साल के लड़कों के दिल पर.

http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.com/2007/07/10-d.html

2 comments:

  1. इस मामले में हम दोनों एक ही नाव की सवारियां हैं, सोनल। फर्क बस इतना है कि आपने चौथी से अंग्रेज़ी पढ़नी शुरू की और मैंने चौथी के बाद हिंदी माध्‍यम स्‍कूल में दाखिला लिया। फिर वक्‍त और व्‍यावहारिकता ने बताया कि अंग्रेज़ी सीखे बिना गुज़ारा नहीं है और मैंने कॉलेज के प्रथम वर्ष में फिर से माध्‍यम बदलकर अंग्रेज़ी कर लिया। अब तक मैं हिंदी की ज़बरदस्‍त हिमायती थी पर अंग्रेज़ी पढ़ने के बाद अपने आदर्शों के खोखलेपन का अहसास हुआ। मैंने जाना कि भाषा कोई भी क्‍यों न हो वो समृद्ध ही होती है क्‍योंकि वह अपने देश-काल की संवेदनाओं की संवाहिका होती है।

    अंग्रेज़ी के श्‍ाब्‍द भी समझ आने के बाद उतने ही अपने लगने लगे जितने अब तक हिंदी और संस्‍कृत के लगते थे। अब मैं दोनों भाषाओं को सीखने की पुरज़ोर कोशिश में लगी हूं। काश! हिंदी के हिमायती एक बार अंग्रेज़ी साहित्‍य का आनंद लेकर देखते और हिंदी को तिरस्‍कार से देखने वाले (लेकिन आपस में हिंदी में ही चटर-पटर करने वाले) हिंदुस्‍तानी हिंदी या अंग्रेज़ी में कुछ भी सार्थक पढ़कर देखते तो आज हमें हिंदी पखवाड़े और हिंदी विभाग की ज़रूरत नहीं पड़ती।

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  2. हर भाषा की अपनी खूबी होती है। हिंदी और अंग्रेजी ही क्या सारी आंचलिक भाषाएँ एक खास तरह की मिठास से भरी होती हैं जिसे बखूबी वही पहचान पाते हैं जो उनमें रच बस के पले बढ़े होते हैं।

    हम लोग दसवीं तक हिंदी माध्यम में पढ़े फिर किताबें अंग्रेजी हो गयीं पर बात चीत का ढर्रा वही हिंदी वाला रह गया। दिक्कत इसी संक्रमण काल की ही होती है। छोटी कक्षा में हो तो अच्छा है पर हाईस्कूल या इंटर के बाद हो तो मुश्किलें बढ़ जाती हैं। हिंदी से बोलचाल की अंग्रेजी में विश्वास हासिल करने में मुझे तो पाँच साल लग गए।

    अलग अलग भाषाओं में जितनी ज्यादा प्रवीणता हो उतना ही अच्छा है। पर हमारा ये समाज अंग्रेजी में ना बोल पाने वालों को जिस दृष्टि से देखता है उस सोच को बदलने की जरूरत है। चीन में अधिकतर लोग अंग्रेजी नहीं जानते। जापान, जर्मनी व फ्राँस की भी वही स्थिति है पर इन देशों ने जो सामाजिक और आर्थिक विकास किया है वो किसी से छुपा नहीं है। इसलिए सम्मान व्यक्ति को उसकी काबिलियत से दिया जाना चाहिए ना कि उसके भाषायी ज्ञान या अज्ञानता की वज़ह से।

    और हाँ शुक्रिया यहाँ मेरी पोस्ट शेयर करने के लिए।

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