Friday, September 12, 2014

Try you may, hope won't fail





waves of time, unrelenting
unleash with fury on the bunds
of hope, frayed yet enduring
slipping 'n standing, alone 'n shunned

up come the clouds threatening
destruction at heart and aim
vainglorious in terminal attempt
to leave nothing to proclaim

rain lashes out an angry downpour
intent on the show of power
under the knifing blows of spear
the crying bunds stand that hour

in the wrath and fury of nature
melts all but the sturdy trail
against character, strength 'n love
heap up the odds, hope won't fail

2 comments:

  1. तुम्हारी इस कविता के भावों को पढ़कर बच्चन जी की ये पंक्तियाँ याद आती हैं..

    कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
    भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था

    स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा
    स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
    ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को
    एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है
    है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है...

    जीवन में आशा का ये दीपक जलता रहे तो परिस्थितियों से संघर्ष करने की क्षमता खुद बा खुद पनपती है..सो यूँ ही इस लौ को जलाए रखो

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  2. The poem re-instates HOPE in our lives. Thanks dear.

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