Wednesday, December 24, 2014

धुंध


आज भोर की धुंध जैसे मेरी ज़िंदगी की कहानी बयां कर रही थी. रस्ता अकेला था, मौसमों ने तन्हाई की चादर ओढ़ रखी थी. पक्षी भी जैसे सहमे कहीं चुप बैठे थे. हवा की ठंढक में सर्दी का खुश्नुमापन भी था, और रूह को झकझोरने वाली कठोरता भी. एक ओर, इक शर्मीली युवती की आधी हंसी जैसी खुल रही थी हवाएं. दूसरी ओर, कोहरे की परत मातम का माहौल बना रही थी – घोर, भीषण, निस्तब्ध. चीखता सन्नाटा.

उस खामोशी में चुनौती थी...यदि हिम्मत कर सको तो अपने ह्रदय की तड़पती गहराइयों से एक नज़्म ढूंढ निकालो. और बरसों की यातना, सदियों का प्रेम उसमें निचोड़कर, उस बंदिश को अपने कंठ का सहारा दो. उसे गाओ. मर्म और वेदना से उत्पन्न एक ऐसे लय का सृजन करो कि तुम्हारी गूँज में फिजायें समा जाएँ. वो गीत, तुम्हारी रचना, तुम्हारा पैदावार...वही तुम्हें इस धुंध से बाहर निकलेगा. नहीं, तो इसी अंधकार में लुप्त हो जाओ, करने दो इस धुंध को तुम्हें भ्रमित, गुमने दो फिर से रास्ता, खो जाने दो उस एकमात्र डोर को जो तुम्हें मंजिल तक ले जा सकती है. हिल जाने दो उस वजह जो, जो आज तक तुम्हारा अस्तित्व बनी हुई है. तुम्हारी आस्था.

धुंध की दीवार थी...और मैं बढ़ी जा रही थी. आस्था ने मेरा, या मैंने उसका, साथ नहीं छोड़ा था. हमेशा की तरह वो मुझे ठेले जा रही थी. “हाँ, बस, उसी मोड़ पर मिलेगा वो”. सच पूछो तो मुझे साफ़ दिखाई भी नहीं दे रहा था. चरों ओर कुहासा था. ज़मीं भी समतल न थी. पेड़ फुसफुसा रहे थे. लेकिन इन सब को भेदती हुई तुम्हारी एक छवि मुझे खींचे जा रही थी. तुम्हारा हँसता हुआ चेहरा. और तुम्हारे गालों के भंवर में बैठी हुई वो खुशनसीब चोरनी. मैं हंस पड़ी. संघर्ष आसान हुआ, बादल कुछ छंटे, और आशा ने रगों में जान फूंकी. धूप न थी, पर उसकी गुनगुनी गर्माहट मेरे भीतर समा गयी.

जब तुम उस मोड़ पर न मिले, और मैंने दोषारोपण के लिए उसे खोजा, तो उसे अदृष्ट पाया. कोहरा घना हो गया था. आखों पर अँधेरा छाने लगा था, कानों में मायूस हवा की शोर थी और पूरे बदन में निमोनिया सी शिथिलता. मेरे घुटने बोल पड़े. कलेजा धक् से किया, और मैं ज़मीन पर ढेर हो गयी.

जब आँखें खुली तो आस्था की गर्म हथेलियाँ मेरा सर सहला रही थीं. रोती हुई आँखें और व्यंगात्मक हंसी. “बस, इतने में?” वो हंसती रही. उस हंसी में प्रहसन और करुणा के बीच का भाव था. मेरे कपड़ों से धूल हटाते हुए उसने मुझे उठाया. कही, “चलें?”

3 comments:

  1. उस खामोशी में चुनौती थी...यदि हिम्मत कर सको तो अपने ह्रदय की तड़पती गहराइयों से एक नज़्म ढूंढ निकालो. और बरसों की यातना, सदियों का प्रेम उसमें निचोड़कर, उस बंदिश को अपने कंठ का सहारा दो. उसे गाओ. मर्म और वेदना से उत्पन्न एक ऐसे लय का सृजन करो कि तुम्हारी गूँज में फिजायें समा जाएँ.

    बेहतरीन लगी ये पंक्तियाँ..लगा कोई दिल की बात कह रहा हो। तुम्हारी ये पोस्ट मुझे ओशो की उस कविता की याद दिला गई जिसका सहारा अपने को ऐसे लमहों से बाहर निकालने के लिए अक्सर लेता हूँ। पूरी कविता तो अलग से भेजूँगा, इस पोस्ट के संदर्भ में उसकी इन पंक्तियों को उद्धृत करना काफी होगा..

    ओ उदासी की किरण भटकी हुई क्या कह रही तू
    धुंधलके के पार यूँ, निस्सार सी क्यूँ बह रही तू ?

    प्रीत का कोई वचन है
    नित निभाना प्रणय प्रण है
    नयन में सपना जगा है
    दर्द भी लगता सगा है

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    1. लगता है जैसे हर भाव के लिए आपके पास कुछ बहतर हमेशा रहता है.
      पूरी कविता का इंतज़ार रहेगा.

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  2. Bada hi khatarnak dhund hai...waise ek baat acchhi hui ki is lekhni ko padhte padhte ahmad faraz ki yaad aa gayi...

    Yeh mere saath kaisi roshini hai,
    Ki mujhse raasta deka na jaaye.

    Yeh aalam shauq ka dekha na jaaye...

    'Faraz' apne siwa hai kaun tera,
    Tujhe tujhse juda dekha na jaaye....

    Yeh aalam shauq ka dekha na jaaye...

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