Tuesday, January 4, 2011

जी ले


जीवन के रोज़मर्रे से
थोड़ा वक़्त निकाल
बैठ खुद के साथ आज
कर खुद पर खयाल

कब था वो आखिरी समय
जब हँसते-हँसते भर आई थी आँख
कब लगाया था एक दोस्त को गले
कब उड़ाई थीं मस्तियाँ लाख?

बैठा है तू जिसके इंतज़ार में
वो सही समय एक धोखा है
कहता है तू मजबूरी जिसे
उसी ज़ंजीर ने तुझे रोका है

क्यों मन इतना उदास है तेरा
क्यों हैं तेरे गाल गीले?
पुकार रहा है तक़दीर तेरा
मौका मिला है, जी ले

किस डर के बोझ में झुका है तू
सपने क्यों पड़ गए हैं पीले?
देख आइने में प्यार से खुद को
मुस्कुरा, और जी ले

तान के सीना चेहरा उठा
दिन ढले जब कंधे थे ढीले
नज़र गड़ा मंज़िल पर और
बढ़ा कदम-कदम जी ले

ये करारे दिन ज़िंदगी के हैं
इससे पहले की सीलें
रख दिल पर हाथ, उड़ान भर
लम्हों में सदियाँ जी ले

2 comments:

  1. Glad to see the sea change from 'Pure chand se kaho' to 'jee le' :)

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  2. तकलीफों को ताकत बनाने की ये सलाह अच्छी है। लम्हों में सदियों का एहसास कराती हुई सी।

    अमर आनंद
    manzilaurmukam.blogspot.cm
    amaranand07@gmail.com

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