Tuesday, January 25, 2011

एक नयी सुबह की तलाश

पता नही क्यों,
एक नयी सुबह को दिल तरसता है...

पता नहीं क्यों,
ये जगह ये घर ये चेहरे ये दफ्तर
सब एक सन्नाटे में
धुँधलाते जाते हैं
उस दूर दुनिया की ओर
जहां सिर्फ मैं हूँ
एक बार फिर बच्ची-सी
जहां न तुम
न तुम्हारे प्यार का हारा ये दिल
न माँ-बाप की किच-किच
न दोस्तों की सलाह
न रास्तों की बंदिश
न यादों की चिता
न पैसा न कौड़ी न कुछ

जहां सिर्फ मैं हूँ
और मेरा बचपन
हँसता खिलखिलाता अटखेलियाँ करता
एक नयी सुबह में

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