Friday, April 23, 2010

तुम न आए

वो मौसम जिसमे मिले थे हम
प्यार में की थीं दूरियां कम
दिन महीने साल बीते
आहें भरते आंसूं पीते
सर्द हवा में विरह सताए
सब यादें आई, पर तुम न आये

वही बारिश जिसमे भीगे थे तन
वो बातें जिनसे मिले थे मन
भर्रायी आवाज़ में निकले थे बोल
बाँध टूटा था मन को खोल
जीने के थे कितने बहाने पाए
वो वजहें धुंधलाई, पर तुम न आए

वादों की डोर से न बंधा है कोई
सिसकने को अब न कंधा है कोई
वो नोंक-झोंक, वो मस्ती की हंसी
वो कोमल स्पर्श, मानो ज़हन में बसी,
वो महकें, वो जगहें, वो सपने फिर आए
उम्मीदें उमड़ आयीं, पर तुम न आए

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