Friday, April 30, 2010

दिल जो टूटा हमारा

उम्मीद भी हिम्मत नहीं करती है

ख्वाहिश क्या जागेगी दुबारा

जब तम्मानाएं भी सच होने से डरती हैं

2 comments:

  1. आप कौन हैं मित्र...अच्छा लिखते हैं...दिल के ग़म को छुता हुआ सा एहसास है।
    अमर आनंद
    manzilaurmukam.blogspot.com

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